tanhaa ishq ke khwaab na bun
तन्हा इश्क के ख़्वाब ना बुन
कभी हमारी बात भी सुन
थोड़ा गम भी उठा प्यारे
फूल चुने हैं खार भी चुन
सुख़ की नींदें सोने वाले
मरहूमी के राग भी सुन
किता
तन्हाई में तेरी याद
जैसे एक सुरीली धुन
जैसे चाँद की ठंडी लौ
जैसे किरणों कि कन मन
जैसे जल-परियों का ताज
जैसे पायल की छन छन
नसीर काज़मी
Tuesday, October 30, 2007
तन्हा इश्क के ख़्वाब ना बुन
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Thursday, October 25, 2007
फिक्र-ए-तामीर-ए-आशियाँ भी है
fikr-e-taameer-e-aashiaN bhi hai
फिक्र-ए-तामीर-ए-आशियाँ भी है
खौफ-ए-बे माहरी-ए-खिजाँ भी है
खाक भी उड़ रही है रास्तों में
आमद-ए-सुबह-ए-समाँ भी है
रंग भी उड़ रहा है फूलों का
गुंचा गुंचा सर्द-फसाँ भी है
ओस भी है कहीं कहीं लरज़ाँ
बज़्म-ए-अंजुमन धुआँ धुआँ भी है
कुछ तो मौसम भी है ख़याल अंगेज़
कुछ तबियत मेरी रवाँ भी है
कुछ तेरा हुस्न भी है होश-रुबा
कुछ मेरी शौकी-ए-बुताँ भी है
हर नफ्स शौक भी है मंजिल का
हर कदम याद-ए-रफ्तुगाँ भी है
वजह-ए-तस्कीं भी है ख़याल उसका
हद से बढ़ जाये तो गिराँ भी है
ज़िन्दगी जिस के दम से है नासिर
याद उसकी अज़ाब-ए-जाँ भी है
नासिर काज़मी
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रंग बरसात ने भरे कुछ तो
rang barsaat ne bhare kuch to
रंग बरसात ने भरे कुछ तो
ज़ख्म दिल के हुए हरे कुछ तो
फुरसत-ए-बेखुदी गनीमत है
गर्दिशें हो गयीं परे कुछ तो
कितने शोरीदा सर थे परवाने
शाम होते ही जल मरे कुछ तो
ऐसा मिलना नहीं तेरा मिलना
दिल मगर जुस्तजू करे कुछ तो
आओ ! नासिर कोई गज़ल छेड़ें
जी बहल जायेगा अरे कुछ तो
नासिर काज़मी
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Wednesday, October 24, 2007
किसे देखें कहाँ देखा ना जाये
kise dekhein kahaaN dekha na jaye
किसे देखें कहाँ देखा ना जाये
वो देखा है जहाँ देखा ना जाये
मेरी बरबादियोँ पर रोने वाले
तुझे महव-ए-फुगाँ देखा ना जाये
सफ़र है और गुरबत का सफ़र है
गम-ए-सद-कारवाँ देखा ना जाये
कहीं आग और कहीं लाशों के अंबार
बस ऐ दौर-ए-ज़मीँ देखा ना जाये
दर-ओ-दीवार वीराँ, शमा मद्धम
शब-ओ-गम का सामान देखा ना जाये
पुरानी सुहब्बतें याद आती है
चरागों का धुआ देखा ना जाये
भरी बरसात खाली जा रही है
सराबर-ए-रवाँ देखा ना जाये
कहीं तुम और कहीं हम, क्या गज़ब है
फिराक-ए-जिस्म-ओ-जाँ देखा ना जाये
वही जो हासिल-ए-हस्ती है नासिर
उसी को मेहेरबाान देखा ना जाये
Nasir Kazmi
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