mujh ko shikast-e-dil ka mazaa yaad aa gayaa
मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मजा याद आ गया
तुम क्यूँ उदास हो गये, क्या याद आ गया
कहने को ज़िन्दगी थी बहुत मुख्तसर मगर
कुछ यूँ बसर हुई के खुदा याद आ गया
बरसे बगैर ही जो घटा गिर के खुल गयी
एक बे-वफा का अहद-ए-वफा याद आ गया
माँगेंगे अब दुआ के उसे भूल जायें हम
लेकिन जो वो बावक्त-ए-दुआ याद आ गया !
हैरत है तुमको देख के मस्जिद में ऐ खुमार
क्या बात हो गयी जो खुदा याद आ गया
खुमार बाराबंकवी
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Wednesday, October 31, 2007
मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मजा याद आ गया
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Jeet
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Thursday, October 25, 2007
हम उन्हें वो हमें भुला बैठे
ham unheN vo hameN bhulaa baiThe
हम उन्हें वो हमें भुला बैठे
दो गुनह-गार ज़हर खा बैठे
हाल-ए-गम कह के गम बढ़ा बैठे
तीर मारे थे तीर खा बैठे
आँधियों जाओ अब करो आराम
हम खुद अपना दिया बुझा बैठे
जी तो हलका हुआ मगर यारों
रो के लुत्फ-ए-गम गँवा बैठे
बे-शहरों का हौसला ही क्या
घर में घबराये, दर पे आ बैठे
उठ के एक बे-वफा ने दे दी जान
रह गये सारे बा-वफा बैठे
जब से बिछड़े वो, मुस्कुराए ना हम
सबने चेहरा तो लब हिला बैठे
हश्र का दिन अभी है दूर "खुमार"
आप क्यूँ ज़ाहिदों में जा बैठे
खुमार बाराबंकवी
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Jeet
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