ab haq meiN bahaaroN ke sabaa hai ke nahiiN hai
अब हक में बहारों के सबा है के नहीं है
फूलों पे वो पहली सी हवा के नहीं है
खुशबू की शहादत भी बड़ी चीज है लेकिन
??? तेरा नक्श-ए-कफ-ए-पा है के नहीं है
वो परतब-ए-रुख अपना हटा लें तो दिखा दूँ
के इन चाँद सितारों में जिया है के नहीं है
ये सोच के ?? नकीबों को पुकारो
रात अपने चरागों को हवा है के नहीं है
ये कौन खबर लाये के गुलशन में मेरे बाद
वो रस्म-ओ-राहे ?? है के नहीं है
जिस गम के लिये तूने किया, तर्क-ए-ताल्लुक
वो गम तुझे पहले से सिवा है के नहीं है
मैखाना खुले या ना खुले सिर्फ ये देखो
शीशों के खनखने की सदा है के नहीं है
ये तो कोई मंसूर बताये तो बताये
के सुली पे तड़पने में मजा है के नहीं है
आ जाओगे हालत की जद पर जो किसी दिन
हो जायेगा मालूम खुदा है के नहीं है
खामोश हैं लेकिन ये खबर सबको है दनिश
वो दुश्मन-ए-एहबाब-ए-वफा है के नहीं है
एहसान दनिश
Saturday, February 2, 2008
अब हक में बहारों के सबा है के नहीं है
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Sunday, January 20, 2008
छुरी जिनके हाथों से खाना पड़े है
chhuri jinke haathoN se khaana paRe hai
छुरी जिनके हाथों से खाना पड़े है
गज़ल भी उन्ही को सुनाना पड़े है
तबीयत को काबू में लाना पड़े है
उट्ठे है कहाँ गम, उठाना पड़े है
कुछ आसान नहीं मंसब-ए-सुर्ख-रूई
कई बार मक्तल में जाना पड़े है
(मंसब-ए-सुर्ख-रूई : Position of honour; मक्तल: Gallows)
ना आ दर्दमंदों की महफिल में प्यारे
यहाँ उम्र भर दिल जलाना पड़े है
कलीम अजीज
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Jeet
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Wednesday, December 26, 2007
शिकस्त-ए-शौक को तामील-ए-आरजू कहिये
shikast-e-shauq ko takmeel-e-aarzuu kahiye
शिकस्त-ए-शौक को तामील-ए-आरजू कहिये
के तिश्नगी को भी पैमान-ओ-सुबू कहिये
ख़याल-ए-यार को दीजिये विसाल-ए-यार का नाम
शब-ए-फिराक को गेसू-ए-मुश्कबू कहिये
चराग-ए-अंजुमन हैरत-ओ-नजारा हैं
लालारू जिनहें अब बाब-ए-आरजू कहिये
शिकायतें भी बहुत हैं हिकायतें भी बहुत
मजा तो जब है के यारों के रु-ब-रू कहिये
महक रही है गज़ल जिक्र-ए-जुल्फ-ए-खुबाँ से
नसीम-ए-सुब्ह की मानिंद कू-ब-कू कहिये
ऐ हुक्म कीजिये फिर खंजरों की दिलजारी
जहाँ-ए-जख्म से अफसाना-ए-गुलू कहिये
जुबाँ-ए-शोख से करते है पुरशिश-ए-अहवाल
और उसके बाद ये कहते हैं आरजू कहिये
किता
है जख्म जख्म मगर क्यूँ ना जानिये उसे फूल
लहू लहू है मगर क्यूँ उसे लहू कहिये
समझिये कामत-ए-याराँ-ए-कजअदा की तरह
??? पाये निगाराँ ???
जहाँ जहाँ भी खिजाँ है वहीं वहीं है बहार
चमन चमन यही अफसाना-ए-नुमू कहिये
जमीँ को दीजिये दिल-ए-मुद्दा तलब का पयाम
खिजाँ को वसत-ए-दामाँ-ए-आरजू कहिये
साँवरिये गज़ल अपनी बयाँ-ए-गालिब से
जबाँ-ए-मीर में भी हाँ कभू कभू कहिये
मगर वो हर्फ धड़कने लगे जो दिल की तरह
मगर वो बात जिसे अपनी गुफ्तगू कहिये
मगर वो आँख के जिसमें निगाह अपनी हो
मगर वो दिल जिसे अपनी जुस्तजू कहिये
किसी के नाम पे सरदार खो चुके हैं जिसे
उसी को अह्ल-ए-तमन्ना की आबरू कहिये
अली सरदार जाफरी
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Jeet
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